Tuesday, 2 January 2018

पसंद

तुझे छुप छुप कर देखना पसंद था मुझे।
तेरा इन नज़रों से नज़र मिलाना और मेरा नज़रें चुरा लेना पसंद था मुझे।।

और फिर तेरा पास आना और मुझे सवालों के घेरे में खड़ा करना पसंद था मुझे।।

नहीं पता था दूर जाते जाते इतने पास आ जाओगे तुम।
इस दिल को इतना लुभा जाओगे तुम।।

अपनी खुदगर्ज़ी पर नाज़ था मुझे।
तेरी मुस्कराहट जो मेरे लिए ही होती थी उसपर फ़क्र था मुझे।।

तुझे अपना बना लेना के सपने पर फ़क्र था मुझे।।
पर उस सपने को तेरे ही हाथों से टूटने देना पसंद था मुझे।।
पसंद था मुझे।।
फ़क्र था मुझे खुद पर।।💗

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मुंबई की एक शाम - 2

कमरे में जाकर काया सोचने लगी कि आखिर उसकी नन्ही सी बेटी कब इतनी बड़ी हो गई उसको पता ही नहीं चला। किया का दिया यह सप्राइज़ उसको सबसे खास और याद...

शायद ऐसा होता तो कितना अच्छा होता।