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Wednesday, 31 March 2021

माँ कुछ लिखा है तुम्हारे लिए।।

माँ आज काफी समय बाद कुछ लिखा है आपके लिए। पता है इसको पढ़ने के लिए आप नहीं हैं यहाँ लेकिन मैं फिर भी आपको भेजूंगी ये।।  जानती हूँ नहीं पढ़ पाओगी इसको फिर भी दूंगी ये आपको। मुझे याद है आप मुझे लिखने के लिए कितना फ़ोर्स करती थी हमेशा बोलती थी ' निधि कुछ लिखी नया नहीं लिखी हो क्या? क्या कर रही हो लिखो कुछ बड़ा मन हो रहा है तुमको पढ़ने का' और मैं झट से फ़ोन लेकर बैठ जाती थी आपके लिए कुछ लिखने। फिर पूरा होते ही कित्तने चाव से आप उसको पढ़ती थी मेरी गलतियां बताती थी। लेकिन अब ऐसा करने वाला कोई नहीं माँ। अब नहीं हो आप उसको पढ़ने के लिए।
माँ पता है जब भी मैं किसी को उसके माँ के साथ मार्केट जाते, स्टॉल पर चाट- टिकिया खाते देखती हूँ न मुझे आपकी याद आ जाती है कि कैसे हम लोग बाहर जाते थे शॉपिंग करके खाते पीते आते थे। माँ पता है जब भी देखती हूँ किसी को अपनी माँ के हाथ से खाना खाते, पैरों पर सर रख कर सोते, उनके साथ मस्ती करते, उनको अपने दिल की बात बताते मुझे आपकी कमी तब बहुत खलती है माँ। आप होतीं तो शायद मैं भी अपने मन के गुबार को निकाल देती कभी आपके कांधे पर सर रखकर तो कभी आपके पैरों पर। पता है माँ कभी कभी जब आपकी बहुत ज्यादा याद आती है आपसे बात करने का मन कर जाता है और हाथ फ़ोन के कीबोर्ड पर एकाएक आपका नम्बर मिलाने लगते हैं फिर जब याद आता है कि अब आप नहीं हो मुझे सुनने या सुनाने के लिए तो आँखों से आंसू यकीनन बिना रुके ही गिरने लग जाते हैं। कभी कभी तो रात को सोते टाइम ही आपकी फोटो देखकर याद आती है और आंसू थमने का नाम नहीं लेतीं तो आपके दामाद जी बड़े प्यार से पूछा करते हैं तब 'बताओ निधि क्या हुआ क्यों रो रही हो? मम्मी की याद आ रही है कोई बात है जो तुम कहना चाहती हो उनसे? तो मुझसे कहो मैं हूँ न तुमको सुनने के लिए बताओ न क्या हुआ है?' उस वक़्त मैं बस ये कह पाती हूँ 'नहीं कुछ नहीं है।' जबकि मुझे पता होता है कि एक गुबार भरा है मेरे मन में जिसको मैं निकालना चाहती हूँ जिसको न निकाला मैंने तो एक वक़्त के बाद वो मुझ पर हावी हो जायेगा और मैं टूट जाऊंगी शायद तब मैं खुद को ख़ो भी दूंगी। 
पता है माँ कभी कभी मन होता है आपसे मिलने का आपको गले लगाने का कुछ कहने का लेकिन ये सब पॉसिबल नहीं है अब। माँ आपके बिना बेकार हो चुकी हूँ मैं। कुछ भी नहीं जानती हूँ मैं अब बस जानती हूँ तो आपको और आपके प्यार को। 
माँ याद है आपको कितना ज़िद करती थी मैं आपसे हर चीज़ के लिए कभी कुछ खाने के लिए तो कभी बाहर जाने के लिए। मार्केट तो जैसे मुझे आपके ही साथ जाना होता था, और आप उफ़ चलने का नाम ही नहीं लेती थीं मुझे कभी ठाकुर आंटी तो कभी शिखा तो कभी बिट्टू के साथ जाने को बोलने लगती थी और मैं ज़िद करके सिर्फ आपके साथ जाती थी फिर भाभी आयीं और फिर कभी आप तो कभी भाभी तो कभी दीदी। मेरी ज़िद भी अलग ही हुआ करती थी आपसे न माँ। आप उसको पूरा भी करती थी साथ में ये ताना देकर यहाँ तो हम झेल ले रहे हैं देखना सासू माँ से अपनी ऐसे ही ज़िद करोगी न तो भगा दी जाओगी। माँ पता यहाँ मम्मी भी वैसी ही हैं जैसे आप थी लेकिन उनसे मैं ज़िद नहीं कर पाती आपके जैसे। 
आप मेरे लिए बहुत स्पेशल थी और हो पर हमेशा रहोगी।
आई लव यू माँ।। ♥️♥️
थैंक यू फॉर बीइंग देयर फॉर मी।। 😘

मुंबई की एक शाम - 2

कमरे में जाकर काया सोचने लगी कि आखिर उसकी नन्ही सी बेटी कब इतनी बड़ी हो गई उसको पता ही नहीं चला। किया का दिया यह सप्राइज़ उसको सबसे खास और याद...

शायद ऐसा होता तो कितना अच्छा होता।