प्यार ही कहाँ था तुम्हें??
जो था वो बस एक जिस्म की प्यास थी।।
जो मैं देना न चाहती थी तुम्हें।।
कारण सिर्फ इतना था कि तू सिर्फ मेरे जिस्म का भूखा था और मैं तेरे रूह की।।
तू मुझे पाना चाहता था कुछ पल के लिए
और मैं तेरी हो जाना चाहती थी पूरे ज़िन्दगी के लिए।।
तेरे साथ जीने के सपने देखे थे मैंने।।
तुझमें लिपट जाने के ख्वाब सजाये थे मैंने।।
तेरे लिए ही तो लिया था ये जीवन मैंने।
पर तूने चुटकी में सब छीन लिया मुझसे।
शुक्र है खुदा का की न दिया था ये जिस्म तुमको।।
क्या पता कब तू इस रूह में और समा जाता।।
तेरे साथ का जो सपना है न आज भी दिल के किसी कोने में कैद है शायद।
क्योंकि आज भी उस दरवाजे को किसी ने खटखटाया नहीं है शायद।।
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