Wednesday, 21 February 2018

मजबूरी है या प्यार

इसे मजबूरी कहो या प्यार,
माँ का हाथ बंटाना अच्छा लगता है।

उनके साथ काम करके उनको थोड़ा आराम देकर,
खुद को तकलीफ देना अच्छा लगता है।

अच्छा लगता है जब वो कहती हैं,
मेरा बच्चा अब बड़ा हो गया है, माँ का हाथ बंटाने वाला हो गया है।

कभी कभी तो सोचा करती हूँ,
हमें पालने में इन हाथों ने कितनी मेहनत की होगी।

न जाने कितने ज़ख्म सहे होंगे,
तब जाकर हम बड़े हुए होंगे।

आज जब इस बच्चे को माँ का हाथ बंटाते देखा,
तो सोचा कि हम कितने आराम से घर पर बैठे अपनी फरमाइशों को माँ-पापा के आगे रख देते हैं और वो उसको पूरा करने में लग जाते हैं।

बिना खुद के बारे में सोचे,
अब इन सबसे हट कर चलो हम भी कुछ ऐसा करते हैं कि वो भी बोले "ये तो मेरी बिटिया ने किया है"

खुद को तकलीफ दे हमें पालना ही तो उनका आखिरी काम था,
अब हमें उनके सपनों को अपना कर पूरा करना हमारा काम है।

इसे प्यार कहें या मजबूरी जब जब उनको अकेला खटकते देखा है मैंने,
एक टीस सी उठती है दिल में पर दूर रहने का ज़ख्म भी तो देखा है मैंने।

देखा है मैंने खुद का पेट काटकर हमारा पेट भरते उनको,
इसको प्यार कहें या मजबूरी इसको तय करने पर गुस्सा करते देखा है उनको।

इसे मजबूरी कहो या प्यार,
उनका हाथ बंटाना अच्छा लगता है।।

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